अथ कुतर्कोपशमनं प्रारप्स्यते—5

अथ कुतर्कोपशमनं प्रारप्स्यते—5

घोरकुण्ठा:—आज बेशक देश में सूखा पड़ता हो और और लोग पानी को तरसते हो लेकिन ये अब से युगों पहले आकाश में तीर मारकर बारिश करवा सकते थे आज ये उसका प्रयोग क्यों नहीं करते ये भी एक रहस्य है।

तर्कपूर्ण समाधान—देश में सूखा पड़ने पर कोई भी व्यक्ति आकाश में तीर मारकर वर्षा नहीं करवा सकता। ये आपने टी.वी. के किसी धारावाहिक में एक निर्देशक की कल्पना को देख लिया। इसलिये आपकी बुद्धि भ्रष्ट हुई है। इसमें दोष हिन्दू धर्म ग्रन्थों का नहीं है। आपकी कुण्ठित मानसिकता का है।

अभी तक तो ऊपर यही कहते आ रहे हो कि ये सारे बुरे लोग हैं आर्यों को वेदों को जो गालियाँ देनी थी दे दी अपशब्द बोलने थे बोल लिये। भारत में रहकर देश व यहाँ की परम्पराओं एवं संस्कृति से द्रोह करना था कर लिया। अब पानी की समस्या जो  कि वास्तव में कुछ अयोग्य नेताओं के कारण एवं वोट की ठेकेदारी करने वाले तुम्हारे जैसे लेागों के कारण हुई है। तो उसको वे लोग सही करें जिनको तुम ही पूर्व में अयोग्य एवं भ्रष्ट बता आये हो।

इस घोर कुण्ठा का सीधा सा तात्पर्य है कि तुम्हारे जैसे लोग धर्मान्तरण करने वाली गैंग से पैसा लेकर मात्र हिन्दू धर्म व महान् भारत की संस्कृति पर प्रश्न चिह्न खड़ा करने का निकृष्ट व्यापार करते हो।

घोर कुण्ठा:— एक गर्दन पर दस-दस तक सिर और एक कंधे पर हजारों हाथ उग सकते हैं ये भी इनकी ही बुद्धिमता की खोज है |

तर्कपूर्ण समाधान—सही कहा भारतीय पुराणों व इतिहास में आश्चर्य करने वाले सारे प्रसंग आलोचना का कारण हो सकते हैं। किन्तु तुम को धर्मान्तरण करने वाली गैंग जो धन देती है। कम से कम उसके झूठे धर्म एव बर्बर धर्मावलम्बियों को तो देखो। कि वहाँ कैसा व्यभिचार मचा है। वहाँ की बर्बर संस्कृति वाले लोग तुम्हारे जैसे धर्मद्रोहियों को पैसा देकर ऐसा अनर्गल लिखवाने का कार्य करती है।

उन धर्मग्रन्थों का एक किस्सा सुनाता हूँ कि दो स्त्रियाँ अपने राजा के पास न्याय के लिये गईं कि एक स्त्री ने दूसरी पर आरोप लगाया कि कल हम दोनों ने मिलकर मेरे बच्चें को काटकर खाया अब आज ये अपने बच्चे को काटकर खाने के लिये तैयार नहीं है। तो राजा ने दूसरी स्त्री को आदेश दिया कि जाओ वैसा करो। तो इनके धर्मग्रन्थों में तो स्त्रियों का ये वर्णन प्राप्त होता है कि माँएं अपने ही बच्चों को काटकर खा लेती थीं।

घोरकुण्ठा:— समुन्द्र यात्रा से मनुष्य गल जाता है ये भी इनकी ही महत्वपूर्ण खोज है |

तर्कपूर्ण समाधान— कोलम्बस की अमेरीका के समुद्री मार्ग की खोज का यात्रा वृतान्त सभी ने पढ़ा है उसमें स्पष्ट वर्णित है कि किस प्रकार भोजन समाप्त होने पर ये काकेशियन जाति के नरमाँसभोजी आपस में लड़े एवं मृत साथियों के माँस को भोजन के रूप में ग्रहण किया। अब भी आप जैसे कुण्ठित को कोई सत्यता चाहिये।

अब आते हैं आपके मूल प्रश्न पर समुद्र यात्रा में मनुष्य गल जाता है ये कौनसे शास्त्र में कहाँ लिखा है। आपकी कुण्ठित मानसिकता में जो आया वो लिखा। कभी अपने भीतर झाँक कर देखें।जिस धर्मान्तरण वाली राष्ट्रद्रोही गैंगों से धन लेकर यहाँ की मूल सभ्यता जो कि एक मात्र मानवीय सभ्यता है के विरूद्ध जो बकवास कर रहे हो। उन गैंगों के सम्प्रदाय के धार्मिक ग्रन्थों में क्या क्या गन्द भरा है प्रथमत: उसे देखो।

उस गन्दगी पर चर्चा इसलिये नहीं की जा सकती कि ये अभक्ष्याभक्ष्य का कार्य तुम्हारे जैसे घृणित राष्ट्रद्रोही व्यक्ति ही कर सकते हैं।

और यदि जलसेना के प्रशिक्षण पर दृष्टिपात् करो तो ज्ञात होगा कि वहाँ लम्बे समय तक समुद्र में रहने वालों के शरीर व त्वचा की सुरक्षार्थ उन्हें विशेष प्रशिक्षण व औषधियाँ दी  जाती हैं ताकि उनके शरीर पर विपरीत प्रभाव न पड़े। ये तो प्रशंसनीय आधुनिक व्यवस्था है।

 घोरकुण्ठा:— पशु पक्षियों में भी मानवीय संवेदना होती है और वो भी मानव की भाषा बोल और समझ सकते हैं ये भी इनकी ही खोज है |

तर्कपूर्ण समाधान— व्यक्ति द्वेष के वशीभूत होकर कितना अन्धा हो जाता है। आज के टी.वी पर चलने वाले आधुनिक विज्ञान के सभी चैनल जिनमें डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्रॉफी, हिस्ट्री  आदि में पशु—पक्षियों के जीवन उनके सामाजिक रहवास, उनके स्वयं के परिवार आदि के बारे में गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है। यही नहीं समुद्र के विशाल जीव व्हैल के बारे में तो यहाँ तक बताया गया है। कि उनके न केवल परिवार हैं अपितु अपने सामाजिक व्यवस्था भी है उसमें उनके प्रत्येक समाज के अपने गीत हैं जिनको वैज्ञानिकों ने मुद्रित (रिकार्डिग) किया एवं उनमें अलग अलग हैं। यही नहीं एक पीढ़ि दूसरी नई पीढ़ि को यह कार्य सीखाती भी है। एवं विज्ञान उनको समझने की चेष्टा कर रहा हैं

ये मूर्ख व्यक्ति अभी हिन्दूओं की बुराई से बाहर नहीं निकला जबकि विज्ञान ने शोध प्रस्तुत किया उससे अनजाने में ही हिन्दू धर्म के शास्त्रीय ग्रन्थेां का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में सत्यता सिद्ध हो रही है।

अपितु ये आधुनिक खोज तो भारतीय धर्मशास्त्रों की प्रामाणिकता को सत्यापित कर रही है। एवं वैज्ञानिकों को सन्देश भी दे रही है कि नई खोज की अपेक्षा प्राचीन भारतीय ज्ञान को बिना पूर्वाग्रह के पढ़ें एवं मानव जाति का कल्याण करें।

घोरकुण्ठा:— मानव क्लोन बनाने की कला में तो ये सिद्धहस्त थे| अगर किसी मनुष्य के रक्त की बूंदे धरती पर पड़ जाती थी तो जितनी बूंदे धरती पर पड़ती थी उसके उतने ही क्लोन पैदा हो जाते थे ।

तर्कपूर्ण समाधान— अन्ततोगत्वा ये राक्षस का उद्धरण देकर सिद्ध कर दिया कि आपकी सोच ही राक्षसी है। क्लोन क्यों टेस्टट्यूब बेबी एवं क्लोन के मिश्रित विज्ञान का विश्व में सर्वश्रेष्ठ  उद्धरण भगवान् वेद व्यास द्वारा गान्धारी के गर्भ से निकली गाँठ द्वारा सौ पुत्र एवं एक पुत्री को उत्पन्न करना है। (इसके लिये हमारा महाभारत पर लिखा गया आलेख पढ़ें) यही नहीं, भगवान् गणेश के मस्तक पर हाथी का मस्तक जोड़ना, दक्ष प्रजापति के मस्तक पर बकरे का मस्तक जोड़ना, जेल में बन्दी बनी हुई श्रीमती देवकी के गर्भ में पलने वाल षण्मासीय भ्रूण को संकर्षित कर रोहिणी के गर्भ में स्थापित करना।  आदि आयुर्विज्ञान का आश्चर्योत्पादक कार्य है। जो कि पूर्णत: जीवविज्ञान है अब यदि वर्तमान में आप नहीं कर सकते तो इसमें आपकी ईर्ष्या उचित ही है।

क्येांकि धर्मान्तरण के नाम पर राष्ट्रान्तरण करने वाली आपकी गैंग जिस धर्म को मानती है वहाँ उनके सम्प्रदाय में ये तो उनकी कल्पना की औकात में भी नहीं हैं।

 घोरकुण्ठा— मानव रक्त भी कोल्ड ड्रिंक और चाय की तरह पिया जा सकता है ये भी इनकी ही महत्त्वपूर्ण खोज थी |

तर्कपूर्णसमाधान— ये तो आप ही जाने क्येांकि वैम्पायर की कल्पना आपकी धर्मान्तरण के नाम राष्ट्रान्तरण करने वाली गैंग के पुराणों में वर्णित है। वैसे भी ब्रिटानिया कबीले एवं इनके आस पास विकसित हुये रोमन सभ्यता से प्रभावित पूरे यूरोप में पिछले दो हजार वर्षों से छोटे बच्चेां को दास के रूप में रखा ही इसीलिये जाता था कि वहाँ की धनिक वर्ग की स्त्रियाँ समय समय पर उन निर्दोष शिशुओं के रक्त को पीती थीं ताकि वे सदा सुन्दर रह सकें। (इसके लिये हमारे यूरोप में नरमाँस भोज पर लिखे गये लेखों को पढ़ें)

यही नहीं ब्रिटानिया कबीले के एक सरदार व उसकी पत्नी का कोई छूत का भयंकर रोग हुआ तो उन्होंने तीन नन्हें नन्हें शिशुओं की नसों को काट काट कर खून पिया कि ठीक होंगे पर  वे शिशु तो मरे ही मरे वे दानव भी मृत्यु को प्राप्त होकर अभी कब्र में पढ़े जजमेण्ट डै (निर्णायक दिवस ) की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि न ही आये तो ठीक है वरन् हेल (नरक) में हमेशा हमेशा के लिये रहना पड़ेगा।

 घोरकुण्ठा:— बच्चे बिना औरत मर्द के पैदा भी किये जा सकते है ये भी इनकी ही खोज थी |

ये मानव शिशु छींक कर, शरीर के मैल द्वारा, पशु पक्षियो के गर्भ द्वारा भी पैदा करवा सकते थे।

तर्कपूर्ण समाधान— सर्वप्रथम धर्मान्तरण के नाम पर राष्ट्रान्तरण वाली गैंग वाले जब कहते हैं कि मिट्टी का पुतला बनाया और उसे बाढ़ पर डाल दिया सुखाने के लिये और उसमें फूँक मारी  तो क्या फूँक से मनुष्य बन सकता है। तो छींक से क्यों नहीं भाई

ऐसा सभी धर्मों के धर्मग्रन्थेां में मनुष्य उत्पत्ति की  प्रक्रिया बताईगई है। यह प्रक्रिया वस्तुत: एक रूपक के द्वारा विभिन्न जैविक परिवर्तनों की प्रक्रिया है। जिसे प्रत्येक व्यक्ति नहीं समझ सकता तुम्हारे जैसे बिके हुये कुण्ठित तो कदापि नहीं। परन्तु मनुष्य के जन्म से पूर्व की जो अलौकिक घटनाएँ हैं उन्हें समझने के लिये तपस्या एवं संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है। फिर एक सत्य गुरू जो तुम्हारी धर्मान्तरण के नाम राष्ट्रान्तरण करवाने वाली भारत विरोधी गैंग के पास तो नहीं। अत: ऐसा सत्य जानना है तो मेरी शरण में आना होगा।

 घोरकुण्ठा—१७. वानर-रीछ जैसे जीव भी बिना पंखो के उड़ सकते हैं ये भी इनकी ही खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान—विज्ञान जब ये कहता है कि आज से 1.5 करोड़ पूर्व ऐसे ऐसे डायनासोर थे। वे ऐसे ऐसे थे, वे ये ये खाते थे, वे विशालयकाय होने के उपरान्त भी उड़ते थे। इस प्रकार विज्ञान के नाम पर जो कल्पना आपको बताईजाये वह सब सत्य है उसे मानने से पूर्व विज्ञानान्धता का उपनेत्र (चश्मा) हम नहीं लगा लेते।

अब आई वानर—रीछ आदि के बिना पंख के उड़ने की बात तो किस ग्रन्थ मे लिखा है कि कौनसा रीछ उड़ा। मात्र भगवान् हनुमान् ने ऊँची छलांग लगाई वह भी उड़ने के समान तो यह उनके ब्रह्मचर्य का सामर्थ्य था। अब तुम्हारे जैसे कुण्ठित व्यभिचारी एवं मातृशक्ति को भोग की दृष्टि से देखने वाले ब्रह्मचर्य को भला कैसे जान सकते हैं।

घोरकुण्ठा:— एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के स्पर्श से, उसकी छाया से भी भ्रष्ट हो सकता है ये भी इनकी ही खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान— स्पर्श्यास्पर्श्य व्यक्ति स्वयं से भी करता है। भाई हम लोग तो शौचालय से आते ही हाथ साबुन अथवा राख अथवा बालू मिट्टी से साफ करते हैं।  ये कुण्ठित महोदय तो शौचालय से बाहर आते ही उन्हीं हाथों से आटा गूँदने लग जाते हैं। कहीं कोई यह न कह दे कि ये तो अपने हाथ से भी अस्पर्श्यता कर रहे हैं।

स्पर्श अथवा अस्पर्श करने के लिये शास्त्रों में वर्णन है यदि आप भोजन कर रहे हैं तो किसी अन्य को स्पर्श नहीं करें अन्यथा वह एवं आप दोनों ही अपवित्र होंगे प्रायश्चित्त करें। यदि किसी के घर में जन्म अथवा मृत्यु हुई है तो निश्चित कालावधि तक उस परिवार के सभी लोग अस्पृश्य हैं चाहे वे किसी भी जाति के हों।

पुन: आज यदि दूरदर्शन पर एवं सभी जगह स्वच्छता का  घोष हो रहा है तो वह सही क्योंकि आधुनिक विज्ञान उसे कह रहा है। परन्तु यदि इसी स्वच्छता को धर्म ने कह दिया तो जातिवाद के नाम पर हिन्दूओं को परस्पर विभाजित करने वाले ये मानसिक रोगी प्रश्नकर्त्ता बन कर खड़े हो जाते हैं।

पर इन कुण्ठित हिन्दू विरोधी धर्मान्तरण वाली गैंग के पीट्ठू के लिये कुछ कहना भैंसे  के आगे बीन बजाना।

डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी

07737050671