अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -—8

अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -—8

कुतर्क- पुराणो में शिवजी के उपनाम “महालिंग”, “चारुलिंग”, “लिंगाध्यक्ष”, “कामुकी”, “शिखण्डी” व “धूर्त” क्यों दिए गए है? इन नामो से शिवजी की “प्रशंसा” होती है या “निंदा”? (शिवपुराण भाषा टीका)

तर्कपूर्ण समाधान:— पुराणों में शिवजी के ये नाम उनके पर्यायवाची के रूप में लिखे हैं। एवं इनमें किसको निंदा दिखी? तो उसका समाधान है— भारतीय धर्मदर्शन को पाश्चात्यों के दृष्टिकोण से देखने वाले धागाधारी म्लेच्छ अथवा धर्मान्तरण एवं आतंकवाद के नाम पर राष्ट्रान्तरण करने वाली हिन्दू विरोधी गैंग को

तो क्या ये सही हैं? ये प्रश्न खड़ा होना स्वाभाविक है तो इसका समाधान है कि लिंग शब्द का अर्थ है चिह्न जैसे शालिग्राम भगवान् विष्णु का चिह्न है उसी प्रकार शिवलिंग शिवजी का चिह्न है न कि उनके गुप्तांग। एवं विश्व की प्राचीन से प्राचीन सभ्यताओं में ईश्वर के कहीं भी चिह्न प्राप्त होते हैं तो शिवलिंग के रूप में ही प्राप्त होते हैं। इसीलिये ये सर्वप्राचीन रूप में पूज्य हैं। इसीलिये ये 1. महालिंग,  सबसे प्रथम होने के अर्थ में। 2. चारुलिंग, सर्वाधिक पूजनीय होने से सर्वप्रिय एवं सुन्दर अर्थ में। 3. लिंगाध्यक्ष ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक अर्थ में।4. कामुकी सभी प्रकार की लौकिक एवं पारलौकिक यानी मोक्षादि कामनाओं की पूर्ति करने में सक्षम अर्थ में। 5. शिखण्डी यह मयूर का पर्यायवाची है जो कि ब्रह्मचर्य एवं ब्रह्मतेज दोनेा का प्रतिपादक है इस अर्थ में। 6.धूर्त सर्वश्रेष्ठ, सर्वशक्तिमान् होते हुये भी धूली को धारण करने वाले अर्थ में। इस प्रकार शिवजी के सहस्राधिक नाम हैं। एवं वे सभी उनकी प्रशंसा के रूप में लिखे गये हैं।

इस प्रकार ये शिवजी की निंदा नही प्रशंसा है। एवं यह ईश्वर की प्रशंसा है। जिनको कुतर्क करना है वे कुतर्क करें। वैसे भी मेरे उत्तर उन श्रद्धावनत हिन्दूओं के लिये हैं जिनके पास मन में श्रद्धा तो है पर इन प्रश्न खड़े करने वाले दुष्टों के कुतकोंं के समाधान नहीं हैं।

अब इसके आगे भी यदि कोई कुतर्क करना चाहता है तो उसके लिये यही कहावत है कि जो मुझसे अधिक गोरा वो पीलिया को रोगी। तो ये झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ने पर भी रिफ्रेश नहीं हुए तो कभी नहीं हो सकते। एवं यू भी शास्त्रार्थ करने की बीमारी उन्हीं को ही होती है जिनको अपनी ईश्वरीय आराधना चुनने का स्वातन्त्र्य नहीं होता। एवं विवश होकर अपनी पूजा को छोड़कर अन्यों की बुराई करते हैं। ये सर्वसिद्ध प्रमाण है कि जो भी निराकार ब्रह्म की उपासना करने की बात करता है वे सभी अपनी उपासना से अधिक साकार की बुराइयाँ करते हैं। प्रश्नकर्त्ता भी इसी कुकर्म सम्मिलित है।

घोर कुतर्क एवं झूठ:— मतस्यपुराण में शिवजी द्वारा दैत्य पुत्र आडि से सम्भोग करके उसे मारने की कथा दी हुई है। शिवजी ने “आडि” लड़के के साथ “अप्राकृतिक दुष्कर्म” करके ही उसे मारने की विधि क्यों स्वीकार की? कोई ऐसा अन्य तरीका जैसे गला घोटकर मारने आदि का रास्ता क्यों नहीं अपनाया था? क्या आप भी हमारी तरह यह मानने को तैयार है कि पुराणों में मिथ्या कथाओं के द्वारा शिवजी को कलंकित किया गया है? (मतस्यपुराण, अध्याय 155)

तर्कपूर्ण समाधान एवं थप्पड़:— मत्स्यपुराणादि किसी भी पुराण में इस प्रकार अप्राकृतिक मैथुन की कोई चर्चा प्राप्त नहीं होती। एवं मत्स्यपुराण के अध्याय 155 में  कुल 35 श्लोक हैं जिनमें मात्र पार्वती एवं शिव की पारस्परिक चर्चा है जिसमें भगवान् शिव माता पार्वती जी से हास परिहास करते हुये लीला कर रहे हैं। एवं पार्वती जी इन संवादों से कुपित हो गई हैं।

अब यहाँ ये प्रश्न होना स्वाभाविक है कि यदि इस प्रकार की चर्चा प्राप्त ही नहीं हो रही है तो ये कुलेख कहाँ से आया ?

तो इसका समाधान है कि ये जानबूझकर हिन्दूओं को हिन्दू धर्म से विरोध करने के लिये लिखा गया झूठ है। जब इस झूठ लिखने वाले ने मत्स्यपुराण का नाम व अध्याय का स्थान दिया है तो प्रत्येक के पास तो ये पुराण होंगे नही कि वे तत्क्षण ही इसको जाँचे। किन्तु भगवती सरस्वती, ब्राह्मण,गुरू एवं महर्षि वेदव्यास एवं सभी देवताओं की कृपा से मेरे पास संस्कृत का सम्पूर्ण तो नहीं किन्तु विशाल साहित्य उपलब्ध है। एवं मैं तुरन्त ही इसको जाँच कर उत्तर दे देता हूँ।

पर इन दुष्टों का मुख्य उद्देश्य तो हिन्दू धर्मदर्शन वेद पुराणादि में हिन्दूओं की अश्रद्धा उत्पन्न करना है। ऐसे में बहुधा तो अश्रद्धा हो ही जायेगी इसीलिये जो भी इनको पढ़े वे अवश्य ही इसको आगे बढ़ाये।

परन्तु दु:खद बात यह है कि जो आर्य जाति में उत्पन्न हुये एवं वेद को अपना सर्वस्व मान रहे हैं वे ही इस प्रकार के कुकर्म में लग कर विभीषण बने हुये हिन्दू धर्म के विरूद्ध दलाली कर रहे हैं।  धिक्कार है इनको इन्होंने अपनी माँ के दूध को लज्जित ही किया है।

डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी

07737050671

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मेरा नाम डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी, वर्तमान में संस्कृत में डी.लिट् हेतु प्रयत्नशील हूँं। मेरे शोध का विषय भारतीय धर्मशास्त्र और उनकी वर्तमान युग में प्रासंगिकता है। भारतीय संस्कृति व परम्पराओं के संवर्द्धन व संरक्षण हेतु मैं कटिबद्ध हूँ।

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