अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -7

अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -7

मूर्खवाचनम्:— संसार के पौराणिक विद्वानों से 31 प्रश्न-आचार्य डॉ श्रीराम आर्य

सभ्यसंवाद:— यद्यपि सत्य सनातन वेद, स्मृति एवं पुराणेतिहास का विरोध करने वाले मूर्ख को तो मात्र थप्पड़ ही मारनी चाहिये अथवा इन जैसे धर्मशास्त्र विरोधियों की जिह्वा कटवा लेनी चाहिये। किन्तु इन अँग्रेजों के व्यभिचार से उत्पन्न मूर्तिपूजन एवं सत्य सनातन वेद पुराणादि शास्त्रों में विभाजन करके मूर्ति पूजा समाप्त करके यहाँ म्लेच्छ धर्म लागू करने की सोच वाले अवेद सन्तानों का मुख कीलित करना आवश्यक है। ब्रह्म समाज की स्थापना करके जो कार्य अँग्रेज नहीं कर सके वह कार्य इन कुण्ठित अँग्रेजों के छद्म सहयोगियों ने की है। मैं प्रत्येक कुण्ठा का तर्कपूर्ण समाधान दूँगा जो इन धागाधारी म्लेच्छों के मुख पर चपेटिका होगी। साथ ही एक मात्र प्रश्न है कि वेद के इन पाखण्डी ठेकेदारों एवं म्लेच्छों में क्या भेद है?

मूर्ख वाचनम्:—हम अपने पौराणिक विद्वानों से कुछ प्रश्न चिरकाल से करते चले आ रहे है, जिनका उत्तर हमें आज तक प्राप्त नहीं हुआ। सभी प्रश्नों के साथ उनके स्थलों को भी दर्शाया गया है। गत चालीस वर्षो से हम आशा लगाये बैठे है कि पौराणिक समुदाय का आखिर कोई विद्वान् तो इनका उत्तर देगा ही।

सभ्यसंवाद:— ये वेद के स्वयम्भू ठेकेदार धागाधारी म्लेच्छ आज तक दयानन्द तिमिर भास्कर एवं धर्मप्रकाश नामक दो पुस्तकों  में दयानन्द एवं सत्यार्थ प्रकाश पर उठाये गये प्रश्नों का समाधान आज तक नहीं कर सके। यही नहीं आर्य समाज कीमौत, दयानन्तछल कपट दर्पण एवं कालूराम शास्त्री का सारा साहित्य ने इनकी नाक काट दी पर न तो इनके पास उनके पर्याप्त उत्तर हैं एवं नही इनमें उनका उत्तर देने का सामर्थ्य पर नकटाई तेरा सहारा का आश्रय लेकर हमसे प्रश्न करने का ठेका इनको किसने दिया। वैसे पुराणों के सन्दर्भ में उठाये गये अनर्गल अश्लील मानसिकता वाली सोच के प्रश्नों का उत्तर भी प्राप्य है। एवं पूर्व अनगिनत कुतर्कों के मैं भगवती सरस्वती, वेदव्यास, वेद, पुराण, स्मृतियों आदि के आधार पर दे चुका हूँ।

सत्य सनातन वेद, पुराणेतिहासाधारित विषय प्रस्तावना

पुराणों के बारे में यह समझना आवश्यक हैकि हमारे यहा पंच देवोपासना प्रचलित है। जिसमें सूर्य, गणपति, शिव, विष्णु एवं देवी। इन सभी देवताओं से सम्बन्धित विभिन्न पुराणों में एक ही परब्रह्म परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों का चरित्र वेदों के आधार पर प्राप्त होता है। एवं जिस जिस पुराण में परब्रह्म के जिस रूप का चरित्र प्राप्त होता है। उस उस में उसी स्वरूप की सर्वोत्कृष्टता, वैशिष्ट्य आदि लिखा है। वे वैशिष्ट्य स्तुति रूप में हैं। एवं वे स्तुतियाँ वेद में परब्रह्म के लिये प्रस्तुत स्तुतियों का पौराणिक स्वरूप हैं। अत: यदि विष्णु की जो स्तुति विष्णु पुराण में प्राप्त होती है। वही देवीभागवतादि ग्रन्थेां में देवी आदि की स्तुति रूप में प्राप्त होती है किन्तु भाव एक ही है। अत: जिनकेे मन में उस कल के छोरे अंग्रेजों के दलाल वेद पाखण्डी सत्य सनातन मूर्तिपूजादि के कुण्ठित विरोधी द्वारा लिखित विकृत भाव युक्त वेदार्थ एवं वेद के रस रूप पुराण के विरूद्ध विष भरा है वे इस सत्य का कभी साक्षात्कार नहीं कर सकते। इन मूर्खों को स्वयं ही पता नहीं है कि ये क्या कर रहे हैं। इनका कार्य मात्र अँग्रेजों द्वारा दिया उस्तरा चलाना है। तथापि इनकी कुण्ठित मानसिकता के कारण उपजे कुतर्कों का तर्कपूर्ण समाधान करेंगे।

कुतर्क:— देवीभागवत पुराण में पुराण बनाने वाले को “धूर्त” क्यों बताया गया है?, तथा यदि व्यास जी ने पुराण बनाये तो उनमे तीनो देवो (1)ब्रह्मा, (2) विष्णु, (3) महादेव की ‘निंदा’ क्यों की गयी है? देखिये-(देवीभागवत पुराण स्कन्द 5, अध्याय 19, श्लोक 12)

तर्कपूर्ण समाधान:—पुराणों के सन्दर्भ में कहे गये कथन वे ही मान्य होंगे जो कि तुमने किसी पाण्डुलिपि से प्राप्त किये हों। अब यदि तुम्हारे जैसे ईर्ष्यालु परम श्रद्धेय गीताप्रेस गोरखपुर की बात करें। तो वहाँ से यह पुराण संक्षिप्त रूप में प्रकाशित है। अत: वहाँ यह बात कहीं उपलब्ध नहीं है। व्यास जी ने कभी भी किसी भी देवता की निंदा नहीं की । देवताओं की वेद के भाष्यकारों यथा सायणादि को हा धूर्त! आदि कहने की क्षमता तो किसी अंग्रेजों के दलाल धागाधारी म्लेच्छ वेद पाखण्डी ही कर सकता है।

अत: आपका प्रश्न ही प्रासंगिक नहीं है। एवं तुने जो लिखा है वह कहीं लिखा नहीं गया अपितु इस प्रकार की बकवास से धर्मान्तरण एवं आतंकवाद के नाम पर राष्ट्रान्तरण करने वाली गुण्डी गैंगों केा हिन्दूओं के विरूद्ध भौंकने का अवसर प्राप्त हो जाता हेै।

डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी

7737050671

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मेरा नाम डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी, वर्तमान में संस्कृत में डी.लिट् हेतु प्रयत्नशील हूँं। मेरे शोध का विषय भारतीय धर्मशास्त्र और उनकी वर्तमान युग में प्रासंगिकता है। भारतीय संस्कृति व परम्पराओं के संवर्द्धन व संरक्षण हेतु मैं कटिबद्ध हूँ।

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