अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -6

अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -6

घोर राष्ट्रविरोधी कुण्ठा:— पशु, मानव से ज्यादा शुद्ध और पवित्र होता है ये भी इनकी ही खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान:— सर्वप्रथम तो ऐसे प्रश्न करने वालों को क्या कहा जाय ये ही सोचना होगा। हमारे हिन्दू धर्म में हम सभी एक हैं एवं कोई उच्च अथवा निम्न नहीं है। यदि कोई ऐसी बात करता है तो मेरे पास आए मैं किसी भी हिन्दू को उसकी जाति पाती पूछे बिना उपनयन करवाकर मंत्र प्रशिक्षण देेता हूँ ताकि वह अपनी पूजा पाठ स्वयं करे।

अब  आगे इन धर्मान्तरण के नाम पर राष्ट्रान्तरण करने वाली राष्ट्रद्रोही गैंग की सोच देखें कितनी अमानवीय है। वस्तुत: ये लोग एवं ये सोच भारत से बाह जहाँ से उत्पन्न हुई है। वहाँ दास प्रथा थी। माता—पिता अपने नवजात शिशु को जन्म होते ही घर के बाहर टोकरी में रख देते थे। उसे कोई भी ले जाये चाहे कुत्ते ही क्यों न उठा ले जायें। उस समय कुछ ऐसे लोग जिन्हेांने ज्ञान की पिपासा शान्त करने के लिये भारत में आकर शिक्षा ग्रहण की थी वे दयालु प्रवृत्ति के लोग इन बच्चों का उठाकर पाला करते थे। किन्तु इस प्रकार के लोग कम थे अधिकतर इनको पालने वाले वे लोग भी इन्हें दास बनाकर बेचा ही करते थे।

उसके बाद इन दासों शोषण प्रारम्भ होता था। शोषण का एक ऐसा घिनौना स्वरूप था जो वर्तमान में एक यूरोपीय टी.वी धारावाहिक ” द गेम आॅफ थ्रोन” में दिखाया  गया है। उसमें किस प्रकार एक दास के साथ ,द्वितीयक श्रेणी का नहीं अपितु अप्राकृतिक जीव की तरह व्यवहार करते हैं। तो इन्होंने विश्व इतिहास में अपने इन घृणित कुकर्मों का छिपाने के लिये हमारे ऊपर महान् सत्य सनातन आर्य हिन्दूओं पर ये आरोप लगाये।

यहाँ तक ही ये सीमित नहीं रहे अपितु हमारे हिन्दू भाईयों को नीचा दिखाने के लिये हिन्दू हिन्दू में वैर बताने के लिये उनकी पशुओं से तुलना करने का घोर एवं निन्दित कर्म कर रहे हैं। इससे स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि इस प्रकार के प्रश्न बनाने वाले दो सम्प्रदाय के लोग हैं। जो हिन्दूओं के विरूद्ध एक जीनोसाईड वार यानि किसी जाति को समाप्त करने का युद्ध चलाये हुये हैं।

इनमें से एक तो भारत में पैदा हुआ है। दूसरा भारत से बाहर। इनका मूल  मकसद ही विश्व की सर्वश्रेष्ठ आर्य जाति जिसकी उत्पत्ति भारत में हुई है(इसके प्रमाण में हमारा आर्य जाति के भारत में उत्पत्ति सम्बन्धी एक मात्र प्रमाणिक लेख पढ़ें)उसको समाप्त करना। इसीलिये इस प्रकार के कुण्ठित प्रश्न व शंकाएँ उठाई जाती हैं।

घोर अमानवीय कुण्ठा:— मानव के स्पर्श से भ्रष्ट से हुआ मनुष्य पशुओं का मूत्र पीकर, या मूत्र छिड़ककर पवित्र हो सकता है ये भी इन्ही की खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान:— पूर्व के प्रश्न मे पर्याप्त समाधान है किन्तु पशुओं के मूत्रपान से कोई पवित्र होता होगा तो ये लोग होंगे। क्येांकि कुत्ते, बिल्लियों, चूहों, आदि के मूँह चाटने उनके चाटे हुये को खाने की परम्परा तो इन पाश्चात्यों की है। हमारी न तो थी एवं न ही है। सम्भवत: अपनी खिसियाहट छिपाने के लिये ये महोदय जानवरों शब्द का प्रयोग कर रहा है।

हम तो हमारी एक अकेली गाय माता के मूत्र को पीकर एवं उसे छिड़ककर पवित्र होते हैं। अब पूरा विश्व एवं वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिकों ने इस विषय को लेकर शोध कार्य प्रारम्भ किया है। एवं उनके परिणाम भी आ रहे हैं।  अभी कुछ समय पूर्व तक तो वैज्ञानिकों ने गोमूत्र से स्वर्ण प्राप्त करने का भी दावा किया है। हमारे ऋषियों की तो खोज थी ही। एवं वे हम सभी के पूजनीय ऋषि थे। उसमें कोई भी ऋषि किसी जाति विशेष के लिये नहीं था। एवं मनु ने तो स्पष्ट रूप से कहा दिया है—एतद्दशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन: स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्या: सर्वमानवा:। सम्पूर्ण पृथ्वी के मानव यहाँ भारत में आकर शिक्षा ग्रहण करें। तब कहाँ जातिगत भेदभाव दिखाई दिया। तुम्हारा काम है हिन्दू विरोध एवं राष्ट्रविरोध ऐसी गद्दार गैंग को सबके सामने प्रकट करना ही मेरा कार्य है। परम श्रद्धेय राजीवदीक्षित जी ने तो भारतीय गुरूकुल परम्परा का जो विवरण प्रस्तुत किया है उसमें स्पष्ट रूप से शिक्षा का व्यापक स्वरूप बताया  है एवं उसमें जाति आदि का कोई भेदभाव नहीं बताया।

घोरकुण्ठा:— स्त्री और शूद्र दोयम दर्जे के नागरिक हैं इनकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती | इनके कोई अधिकार नहीं होते | इनको अपनी इच्छा के अनुसार प्रयोग किया जा सकता है ये भी इन्ही की खोज थी |

तर्कपूर्ण समाधान:— अभी ये हिन्दू विरोधी गैंग हिन्दू हिन्दू में लड़ाई करवाने की बातें कर रही थी। अब ये घर घर में वैर के बीज बोना चाहती है। जिन्हें ये प्रश्नकर्ता हमारी आड़ में नीचा दिखाने का प्रयत्न कर रहा है। उसका समाधान तो पूर्व के समाधान में इसके मूँह पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह  इस पर पड़ चुका है।

अब आते हैं स्त्रियों के सन्दर्भ में तो यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते तत्र रमन्ते देवता। सर्व प्रसिद्ध सूक्ति हैं स्मृतियों की जिसने विश्व में स्त्रियों के सम्मान को बढ़ाया है। वास्तव मे क्या है कि आधुनिक काल में विश्व मंच पर जो सम्प्रदाय चल रहे हैं। उसमें भारत में जिन धर्मों का अभ्युदय हुआ उसके अलावा अन्य विचारों एवं सम्प्रदायों के दार्शनिक मतानुसार स्त्री में आत्मा होती ही नहीं है स्वयं अरस्तु एवं प्लेटो आदि के स्त्रियों से सम्बन्धी दार्शनिक विचार सुनकर आप हतप्रभ रह जायेंगे मुझे तो लिखने में लज्जा आती है कि ये लोग किस प्रकार दास स्त्रियों के सम्बन्ध में अपने अधिकारों को विधि का जामा पहनाते हुये स्त्रियों का शोषण करते थे।

यही नहीं जब यूरोप में धर्मान्तरण प्रारम्भ हुआ उसमें सर्वप्रथम इथिलबर्ट नामक ब्रिटानिया कबीले के सरदार धर्मान्तरित हुये एवं उसने सभी को धर्मान्तरित होने के लिये आदेश कर दिया। उसमें जो वहाँ के पूर्व किसी प्राचीन धर्म को मानने वाले थे वे जब धर्मान्तरित नहीं होेते थे तो उनके साथ छूआछूत की जाती थी। एवं उनकी स्त्रियों को डायन व चुड़ैल, काला जादू करने वाली बता कर जीवित जला दिया जाता था। इस प्रकार ईसवी सन्1100 से लेकर 1500 तक कुल 400 वर्षों में पूरे यूरोप में कुल 4.50 स्त्रियों को डायन बता कर जला दिया गया।

आप मेरी बात पर विश्वास न करें अपितु ”द डाविंची कोड” फिल्म व सीक्रेट सोसाइटीज, व सेटानिक इल्युमिनाटी ब्लडलाइन आदि पुस्तकों को अध्ययन करें। वहाँ इस सम्बन्ध में इससे अधिक घिनौने प्रमाण भरे पड़े हैं।

अत: इन यूरोपीय गोरेपिशाचों ने अपनी हवस एवं मानव भक्षण के कुत्सित पापकर्मों को छिपाने के लिये विश्व की सर्वश्रेष्ठ एवं एकमात्र मानवीय सभ्यता को बदनाम करना प्रारम्भ कर दिया। एवं इसमें सर्वाधिक भागीदारी धर्मान्तरण वाली गुण्डी गैंग एवं उनके गुर्गों का है।

घोर कुण्ठा:— पूजा-अर्चना और हवन के द्वारा भी बारिश करवाई और रोकी जा सकती है ये भी इन्ही की खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान:— पूजा—अर्चन एवं हवन से वर्षा का होना तो सुना है ये महोदय अपनी कुण्ठा में उसे रोकने के अनर्गल ज्ञान प्रस्तुत कर रहे है। सर्वज्ञात है भोपाल गैस दुर्घटना के समय दो परिवार जो कि अग्निहोत्री थे। वे इसीलिये बचे कि उन्होंने रात्री में भी यज्ञ किया। इसीलिये उनकी सुरक्षा हो सकी।

आधुनिक विज्ञान जिसमें एक शाखा है रसायन शास्त्र उसके अन्तर्गत यदि प्रदूषण की आयन आधारित परिभाषा पढ़ें तो उसके अनुसार वायुमण्डल में धनायनों की मात्रा में वृद्धि एवं यज्ञ से ऋणायनों की उत्पत्ति ही होती है। कैसे तो इसके लिये इस इलेक्ट्रो केमेस्ट्री को गहनता से अध्ययन करना होगा।

दूसरा यज्ञ से फार्मेल्डिहाईड नामक एक पदार्थ बनता है जिसका कार्य किसी भी रासायनिक क्रिया में भाग न लेते हुये वातावरण में परिवर्तन करना। एवं उसके द्वारा परिवर्तित वातावरण जीव जगत् के लिये हितकर होता है। एवं यदि प्रकृति में वर्षा के समय में किसी कारणों से वर्षा नहीं हो रही होती तो आधुनिक विज्ञान द्वारा विभिन्न प्रकार के रासायनिक  पदार्थ के साथ कुछ अन्य पदार्थों का वायुयान द्वारा आकाश में छिड़काव किया जाता है परिणाम स्वरूप वर्षा होती है। आज भी जब वनों में भयंकर दावानल उठता है तो सरकारें इस प्रकार कृत्रिम वर्षा करवाती है।

इस प्रकार का विज्ञान प्राचीन ऋषि भी जानते थे। एवं उनका विधिविधान आज के विज्ञान से भिन्न एवं सरल था। तो इसमें ऋषियों की योग्यता है। एवं आशा करते हैंकि आधुनिक विज्ञान भी उन ऊँचाईयों का छूऐगा।अब यदि विज्ञान करे तो वे सही है यदि हिन्दूधर्म करे तो वह असहनीय हो जाता है इन राष्ट्रद्रोही हिन्दूविरोधी गैंग के लिये।

घोर यौन कुण्ठा:— अगर किसी स्त्री को एक ही पुरुष में उपयुक्त पति नहीं मिलता है तो वो पांच या उससे अधिक भी आदमियों को अपने पतियों के रूप में स्वीकार कर सकती है ये भी इन्ही की खोज थी।

तर्कपूर्णसमाधान:— अभी आप पूर्व में कह रहे थे कि स्त्रियेां को अध्ययन का अधिकार नहीं है वे अपनी स्वेच्छा से कुछ नहीं कर सकती और अभी ही कह रहे कि पाँच पतियों को चुन सकती है। ये सब बातें आपके मन की कुण्ठा को ही सिद्ध करती हैं कि आपके मन में हिन्दू धर्म के प्रति कितना विरोध भरा है। जिस विषय को पढ़ा ही नहीं उस पर बोलने का धन्धा है। केवल मात्र प्रश्न करने के लिये प्रश्न करते जा रहे हैं। एक बार स्त्रियों को पढ़ने तक का अधिकार नहीं दूसरी बार पाँच पाँच पति चुनने का अधिकार है।

पाश्चात्य जगत् में भी यही है कि विश्व में जितनी भी स्त्रियाँ सन्यास लेंगी तो वे किसी एक व्यक्ति के नाम की पत्नियाँ बन जाने की सौगन्ध लें। अब ये उनकी धार्मिक परम्परा है एवं हमें उनसे कोई लेना देना नहीं है अत: वे भी हमारे बारे में कुछ नहीं बोलें। द्वितीय पाश्चात्य जगत् में यूरोप आदि देशों में 1970 तक तीन स्त्रियों की गवाही को एक पुरूष के बराबर माना जाता था। अब ऐसे कुतर्की भारत में धर्मान्तरण के लिये स्त्रियों के विषय में चिन्ता कर रहे हैं।

भारत से बाहर के मनुष्य देह वाले पशुओं में तो प्रचलित है कि एक व्यक्ति जिससे चाहे जितनी चाहे महिलाओं से विवाह करे चाहे वह उसकी आयु कितनी भी हो। अभी आई एस आई एस के कुकर्म सम्पूर्ण विश्व ने देखे। पर किसी की हिम्मत नहीं कुछ भौंक सके। बस भारत के महान् सनातन आर्य हिन्दूओं के लिये ही भौंकना आता है।

इसीलिये विश्व की सर्वोत्तम एवं प्राचीन आर्य हिन्दूओं पर कीचड़ उछालने से तुम्हारी कालिख जो तुम्हारे खून में है वह धुल नहीं सकती।

घोरकुण्ठा:— माता एक औरत को पांच भाइयो के बीच में किसी वस्तु की तरह बाँट सकती है ये भी इन्हीं की खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान:— जब प्रश्न समाप्त होने लगते हैं। तो एक ही प्रश्न को पुन: पुन: विभिन्न विधियों से पूछे जाते हैं। इस भारत विरोधी धर्मान्तरण का धन्धा करने वाली गैंग के पास येतो है पर वो तो बताए कि इनके प्राचीन पूर्वज जिनके पुराणों पर ये चलते हैं उनके अनुसार प्रथम सन्तान को सम्पत्ति मिलती थी इसलिये यदि प्रथम सन्तान पुत्री हुई तो उनमें अपनी सम्पत्ति बचाने के लिये बड़ी पुत्री से सगा छोटा भाई ही विवाह कर लेता था। (पढ़ें— प्राचीन सभ्यताएँ श्रीराम गोयल की पुस्तक में एवं देखें विदेशी चैनलों पर चलने वाला धारावाहिक ‘द गेम आॅफ थ्रोन’) तो हमसे पूछने वाले प्रथम तो अपने पूर्वजों की गन्दी पुरापरम्परा को देखें फिर हमारे धर्मग्रन्थेां कोे पूरा पढ़ेंं।

उसके बाद ही कुछ कहें यहाँ में वेद के नाम पर सनातन मूर्तिपूजा के विरोधी अँग्रेजों के छद्म सहयोगियों को भी चुनौती दे रहा हूँ।

घोर कुण्ठा:— अगर किसी औरत का गर्भपात हो जाता है तो उसका भ्रूण नष्ट होने से बचाया जा सकता है और उस भ्रूण को सौ टुकडो में बांटकर सौ या उससे अधिक संताने पैदा की जा सकती हैं ये भी इनकी ही खोज थी |

तर्कपूर्ण समाधान:— इसके लिये पढिये हमारे आलेख ”हमारे धर्मशास्त्रों के कुछ सत्य और तथ्य—1”समाधान तर्क एवं आधुनिक विज्ञान के आधार पर दिया है। फिर भी यहाँ बता दें कि आज आधुनिक औषधि विज्ञानी किसी भी बालक के जन्म के समय उसकी नाल जो माँ व बालक को जोड़े रखती है उसके संरक्षण हेतु अकाण्ट उपलब्ध करवाती है ताकि यदि भविष्य में उस बालक को कोई अनोपचार्य रोग हो तो उससे स्टेम सेल विकसित करके उपचार किया जा सके। तो इसमें क्या आश्चर्य है कि महर्षि वेद व्यास ने एक माँस पिण्ड जिसकी उत्पत्ति ही बालक निर्माण की दृष्टि से हुई है उससे 101 शिशुओं का उत्पन्न किया जाय।

घोर कुण्ठा:— मानव और जानवर के सिर आपस में बदले जा सकते हैं ये भी इनकी ही खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान:— पूर्व के प्रश्नों में इनका समाधान हो चुका है। पहले ही कहा था कि जब तर्क वैर, ईर्ष्या, द्वेष आदि की भावना से एवं किसी धर्म को समाप्त करने के षड्यन्त्र पर आधारित हो तो ज्ञात ही नहीं रहता कि एक ही प्रश्न को कितनी बार पूछा जा चुका है।ये शल्य क्रिया का अद्भुत संयोग है जो इनकी सोच एवं ज्ञान क्षमता से परे है।

घोर कुण्ठा:— मानव और हाथी का रक्त ग्रुप एक होता है ये भी इनकी ही खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान:— प्रश्न की समाप्ती पर पहले तो प्रश्नों का ही दोहरान चल रहा था। अब तो ऐसे ऐसे आरेाप लागाये जा रहे हैं जिनका कि उनको स्वयं को भी पता नहीं।

वैसे आधुनिक विज्ञान भी ऐसा प्रयत्न कर रहा है कि या तो प्रयोगशाला में ही रक्त का निर्माण हो अथवा पशुओं के रक्त से रक्त की कमी को पूरा किया जाय।

घोरकुण्ठा:— चूहे पर बैठकर भी मनुष्य सवारी कर सकता है ये भी इनकी ही खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान:— चूहे पर मनुष्य नहीं भगवान् बैठते हैं। कृपया प्रश्न करने की दौड़ में सत्यासत्य को जानों। धर्मान्तरण गैंग एवं के झूठे ठेकेदार अंग्रेजों छद्म सेवक के पास कुछ नहीं बचा तो कुछ तो बकवास की जाय यह सिद्धान्त अपना लिया।

घोरकुण्ठा:— वैज्ञानिक बेशक आज तक किसी मनुष्य का भविष्य बताने में सक्षम न हो लेकिन ये किसी का भी भूत,भविष्य और वर्तमान बताने में सक्षम है |

तर्कपूर्ण समाधान:— वैज्ञानिक बेचारो के पास भौतिक एवं रसायन शाला हैं। ध्यान की अवस्था एवं वैसा ज्ञान नहीं है। तो अब खिसायानी बिल्ली खम्भानौंचे वाली स्थिति हो गई है।

अब जब आधुनिक विज्ञान अन्तरिक्ष में उपग्रहों के कचरे के माध्यम से मात्र आँधी तूफान की भविष्यवाणी करते हैं तो वह सही है। किन्त ज्योतिष के आधार पर सम्पूर्ण ग्रहों उनकी गतियों उनकी दूरियों का सही सही विवरण उपलब्ध है वह वैशिष्टय नहीं दिख रहा उसकी बुराई दिख रही है। प्रश्नकर्त्ता स्वयं कितनी ही बार ज्योतिषाचार्य के पास गया होगा। पर यहाँ देशद्रोही धर्मान्तरण गैंग से धन ले रखा हैं उसका क्या करेंगे। और इनके साथ हमारे ही कुछ गद्दार वेद के झूठे स्वयंभू ठेकेदार भी तो हैं। इसीलिये कुछ तो बकवास करनी है। ऐसे में ऋषियो द्वारा प्रदत्त ज्ञान की ही आलोचना करें।

घोरकुण्ठा:— पृथ्वी, सूर्य,चन्द्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि,सोम जैसे गृह भी जीवित प्राणी ही नहीं देवता भी हैं जो किसी का शुभ और अशुभ कर सकते हैं| ये भी इन्ही की खोज थी।

तर्कपूर्ण समाधान:— पृथ्वी के अलावा कहीं जीवन नहीं है एैसा विज्ञान कहा करता था। किन्तु वह भी विज्ञानके प्रारम्भिक युग में अब तो विज्ञान ने प्रशान्त महासागर के तल मे ऐसे ऐसे जीवों की खोज की है जो उच्च् रक्ताचाप के आधार पर जीवित हैं। उसी प्रकार सूर्य पर भी जीव के अस्तित्व को अस्वीकार करना मूर्खता होगी। यही नहीं आधुनिक विज्ञान तो अब यह भी स्वीकारने लगा है कि जीवन का तात्पर्य केवल वही नहीं है जो हम पृथ्वी पर देख रहे हैं उसका स्वरूप कुछ परिवर्तित भी हो सकता है। वैसे आधुनिक विज्ञान द्वारा ऐलियन का जो पक्ष रखा जा रहा है वह डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्रोफी, हिस्ट्री आदि वैदेशिक दूरदर्शनों पर धड़ल्ले से दिखाया जा रहा है। पर हमें तो अपने ही ऋषियों के ज्ञान को बुरा बताने का मानसिक रोग है।

घोर कुण्ठा— कितनी महान खोजे है इनकी जिनसे विश्व में भारतका नाम रोशन हुआ है लेकिन आरक्षण वालों ने आकर इनकी योग्यता को रोक का रख दिया है| बेचारे अब ऐसे अविष्कार और खोजें नहीं कर सकते है।

तर्कपूर्ण समाधान— बेतार का तार, वायुयान बाबूराव शिवराव तलपळे, वनस्पतियों में जीवन है। हिग्सबोसोन आदि कितने कितने आाविष्कार भारतीयों ने खोजे हैं किन्तु इनकी बुद्धि तो एक स्थान पर सुई तरह अटकी हुई है। और इनका उद्देश्य केवल हिन्दूओं में ऊँच नीच के आधार पर बँटवारा करना है। ही बात आरक्षण की तो उसे कोई भी शिक्षित व्यक्ति एवं आत्मगौरव वाला व्यक्ति स्वीकार नहीं करता।

घोर कुण्ठा:— ये सब काल्पनिक है दोस्तों और काल्पनिक भगवान ….जागो (sc/st) मुस्लिम ब्राह्मणवाद से छुटकारा पाओ।

तर्कपूर्ण समाधान:—अब अन्त में आये हैं अपनी सत्य सोच पर ये महोदय नास्तिक हैं। अपनी नास्तिकता की खिचड़ी पकाने के लिये राष्ट्रद्रोही धर्मान्तरण गैंग से नियमित रूप से धन लेते हैं। एवं अपनी कुण्ठा निकालने के लिये इस प्रकार के प्रश्न खड़े करते हैं।

मैंने इन कुण्ठित राष्ट्र विरोधी गैंग के मुर्गे को पिछले पाँच अंकों में सटीक उत्तर दिये अब यदि यहपुन: प्रश्नकर्ता है तो निश्चित ही नकटा है। वैसे ये कुत्ते की पूँछ हैं। पर हमें इनकों प्रत्युत्तर देना है।

डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी

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मेरा नाम डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी, वर्तमान में संस्कृत में डी.लिट् हेतु प्रयत्नशील हूँं। मेरे शोध का विषय भारतीय धर्मशास्त्र और उनकी वर्तमान युग में प्रासंगिकता है। भारतीय संस्कृति व परम्पराओं के संवर्द्धन व संरक्षण हेतु मैं कटिबद्ध हूँ।

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