अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -4

अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -4

हिन्दू धर्म के विरूद्ध जो विभिन्न स्तर पर संघर्ष चल रहा है उसमें हमारे शत्रुओं को जो लगातार असफलता मिली है वह हमारे बौद्धिक साहित्य के कारण मिली है। इसीलिये आज वर्तमान काल तक करोड़ों हिन्दू आर्यवीरों एवं वीरांगनाओं बालकों एवं वृद्धों की नृशंस एवं अमानवीय तरीके से की गई हत्या के उपरान्त भी हम जीवित हैं। इस बार के युद्ध में हमारे शत्रुओं ने हमारे आर्य वीरों एवं वीरांगनाओं पर आक्रमण करने के साथ ही साथ हमारे साहित्य, धर्मशास्त्र हमारी परम्पराओं हमारे प्रकृति के साथ सामंजस्य को प्रकट करने वाले ज्ञान पर भी आघात करना प्रारम्भ किया है। इसीलिये हिन्दू धर्मनिष्ठों के लिये आवश्यक बन गया है कि शत्रुओं को प्रत्येक स्तर पर मात दी जाय। इसी शृंखला में मैंने इनके कुतर्कों का प्रत्येक स्तर पर प्रत्युत्तर देने का संकल्प लिया है।

आज यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस प्रकार के प्रश्नों को हमारे समक्ष प्रस्तुत करने का सामर्थ्य विधर्मी म्लेच्छों में नहीं है। ये तो कुछ ऐसे लोग हैं जो घर के भेदी हैं। जिनमें वे अधिक है जो वेद विरोधी हैं। जिनका जन्म यहाँ भारत में ही हुआ किन्तु वे न जाने कब वेद विरोधी हो गये। हमारे में से निकले एवं हमारे ही पाँव काटने लगे हैं। पर उन मूर्खों को ये आभास नहीं है कि उनका स्वयं का अस्त्तित्व हमारे ऊपर ही आधारित है।

इनमें सर्वाधिक वे लोग घातक हैं जो स्वयं को वेद के स्वयम्भू ठेकेदार बताते हुये, वेद, उपनिषद्  के प्राचीन भाष्यकार शंकराचार्य, महीधर, सायण, उव्वट आदि की बुराई करते हुये अपमानित करके अपने किसी नौसिखिये के अनुसर मूर्तिपूजा का विरोध करते हुये शाश्वत सत्य सनातन आर्य संस्कृति का विरोध करते हैं।

ये सर्वसिद्ध सत्य है कि जिन जिन मत मतान्तरों का प्रादुर्भाव भारत की पावन भूमि पर हुआ है। उनका वेद से अलग अस्तित्व नहीं है। यदि वे अलग होना चाहेंगे तो वे स्वयं का अनिष्ट करेंगे। यद्यपि उन्होंने स्वयं को वेद से अलग करने का प्रयास किया किन्तु ओम को उन्होंने भी यथातथ स्वीकार किया। परन्तु उनका स्वयं को वेद से अलग करना वैसे ही जैसे यदि किसी विशाल वृक्ष की कोई शाखा स्वयं को वृक्ष मानकर मूल वृक्ष से छिन्न होकर रहना चाहे। तो ऐसे में वृक्ष को तो शाखा के कटने की पीड़ा होगी किन्तु शाखा को पूरा ही सूखना पड़ेगा। अत: साथियों ये सारे प्रश्न एवं कुतर्क हमारे वेद में से प्रकट हुये एक नास्तिक सम्प्रदाय के कुण्ठित मस्तिष्क की उपज है। किन्तु इनके उत्तर सभी पाठकों को पसन्द आ रहे हैं। एवं उनके दूरभाष व व्यक्तिश: सन्देश आ रहे हैं। इसके  लिये सभी का आभार।

घोर कुण्ठा:— वैज्ञानिक बेशक आज तक मनुष्य की उम्र बढ़ाने और उसको अजर, अमर बनाने की औषधि नहीं खोज पाए हो लेकिन ये अब से कई युगों पहले मनुष्य को अमरता का रसास्वादन करवा चुके है ये अलग बात है इनके द्वारा अमर किये गए अश्वत्थामा जैसे मानव कभी भी देखने को नहीं मिलते हैं |

तर्कपूर्ण् समाधान— सर्वप्रथम तो ये मानने के लिये धन्यवाद कि आज का वैज्ञानिक भी व्यक्ति की दीर्घायु हेतु नित नये प्रयोगों एवं आविष्कारों हेतु प्रयत्नशील है। इसमें यदि प्राचीन ऋषियों ने सफलता प्राप्त कर ली तो इसमें ऋषियों का ही दोष है कि आप कुतर्की महानुभव की अनुमति के बिना  ऋषियों ने पूर्व में ही शोध कर लिये एवं वह भी प्रकृति के साथ रह कर वो भी प्राणों के सतत् आयाम मात्र से ही। आप प्रश्न कर्ता के लिये तो डूब मरने की बात है। और आधुनिक विज्ञान दीर्घायुत्व हेतु प्रयत्नशील है हमारा तो उनको भी यही परामर्श है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान भी आधुनिक विज्ञान की ही तरह है किन्तु वह प्रयोगशालाओं की भित्तियों से बाहर ईश्वर की प्राकृतिक प्रयोगशाला में प्रमाणित हेाता रहा है अत: आधुनिक वैज्ञानिक पूर्वाग्रह का त्याग करके भारतीय ऋषि प्रसाद को ग्रहण करें तो लोक एवं मानव जाति का कल्याण होगा।

अब आते हैं अश्वत्थामा के विषय पर तो उनकी दीर्घायु उनके लिये वरदान नहीं अपितु भगवान् कृष्ण का शाप है। उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र चलाने के लिये भगवान् ने उसे शाप दिया था। ये सर्वविदित है कि दीर्घायु वरदान नहीं अभिशाप ही होती है। एक व्यक्ति स्वयं अपने सामने अपने पुत्र, पौत्रों, पुत्र वधुओ, बहनोंं, आदि अपने से छोटे सम्बन्धियों को जिनको पाल पोस कर बड़ा करे उनकी मृत्यु देखता है। ऐसे में उस दीर्घायु मनुष्य के लिये सन्यास के रूप में वनवास ही एक मात्र मार्ग रहता है।

अब अश्वत्थामा जी आपको नही दिखे तो इसमें निश्चित ही अश्वत्थामा जी ही अपराधी होंगे। परन्तु कुम्भ के प्रत्येक स्नान पर कईयों को किसी व्यक्ति विशेष के दर्शन होते रहते हैं। अबकी बार कुम्भ मेले में तांगा घुमवा देंगे और स्थान स्थान पर संदेश के पत्र चिपका देंगे कि कृपया अश्वत्थमा अंकल इन प्रश्न कर्ता कुण्ठित से मिलें। अब यदि उन्होंने आप पर क्रोध कर लिया तो आप ही जाने।

 घोरकुण्ठा:— बेशक विश्व में कभी भी आकाशवाणी का प्रसारण भारत से बाद में हुआ लेकिन ये उससे बहुत पहले ऐसी व्यवस्था का निर्माण कर चुके थे जिससे किसी युद्ध का आँखों देखा हाल बिना किसी भी कैमरा जैसे यंत्र की मदद के दिव्यदृष्टि के द्वारा किया जा सकता था लेकिन उसके बाद में उसका प्रयोग इन्होने क्यों नहीं किया ये अलग एक विचारणीय प्रश्न है.

तर्कपूर्ण समाधान— सम्पूर्ण विश्व ने दूरदर्शन का आदर्श रूप जहाँ से प्राप्त किया ये महोदय उसे ही हास्य का स्थान बता रहे हैं। ये निश्चित ही उसी सम्प्रदाय के व्यक्ति हैं जो हिन्दू विरोधी है एवं हिन्दू धर्मशास्त्रों को अपमानित करना चाहता है। यदि तुम हिन्दू ही नहीं हो तो हिन्दू धर्म के बारे में बोलने का क्या अधिकार है।

खेर विरोध करने पर ही सही हिन्दू धर्म की विशेषताएँ तो उजागर हुईं कि भारत में ऐसी भी विधा थी कि कोई व्यक्ति दूरदर्शन का प्रयोग जानता था। किन्तु इन महोदय को इससे तकलीफ नहीं है कि संजय ने युद्ध देखा। इनको तकलीफ इससे है कि इन सभी प्रमाणों से यह स्वयं सिद्ध सत्य पुन: सिद्ध होता है कि विश्व मे एक मात्र आर्य संस्कृति थी। वही सर्वप्राचीन, सर्वश्रेष्ठ है।

आज हम एक मोबाइल से किसी से भी दृश्य वार्तालाप कर सकते हैं। क्योंकि यहाँ उपकरण है इसीलिये ये विज्ञान है। परन्तु महाभारत में संजय द्वारा दृष्ट विवरण में कोई उपकरण नहीं है तब तो वो अधिक संश्लेषित विज्ञान हुआ। पर इन हिन्दू विरोधी कुतर्कियों के लिये ये अपराध हो गया। यही नहीं इन्होंने प्रश्न खड़े कर दिये। ये प्रशंसा नहीं कर पा रहे हैं। इनके कार्य मानव कल्याण के कभी नहीं रहे।

इसके विपरीत इन्होंने भारत ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व में धर्मान्तरण का ही कार्य किया है। इनके नास्तिक धर्म में हिन्दू धर्म की बुराईयों के अलावा कुछ है ही नहीं।

घोर कुण्ठा:— विश्व का कोई भी देश आज तक सूर्य पर नहीं पहुँच सका है लेकिन ये अबसे पहले सूर्य पर होकर आ चुके हैं।

तर्कपूर्ण समाधान— रामायण में गिद्धराज जटायु एवं उसके भाई सम्पाती द्वारा सूर्य की ओर उड़ने की एवं सूर्य के तेज से झुलस कर पृथ्वी पर गिरने की घटना का वर्णन आता  है। किन्तु हिन्दू धर्म के प्रति ईर्ष्या एवं द्वेष के कारण इन कुण्ठित महोदय ने अनावश्यक ही लिख दिया। जो इनको मन में आया। कहावत है ने झूठ तो फिर कंजूसी कैसी।

दूसरा प्रसंग महर्षि याज्ञवल्क्य जी का आता है उन्होंने सूर्य भगवान् शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा का अध्ययन किया ये उनका ब्रह्म तेज था। पर ये तपस्या का विषय है जो पशुओं की भाँति अभक्ष्या भक्षण करते हैं एवं राक्षसों की भाँति भोगवादी प्रवृत्ति की हैं उनके वश में यह है नहीं अब यदि ये नहीं कर सके तो दूसरे ने कैसे कर लिया यही इनकी ईर्ष्या का कारण है।

तीसरी बार हनुमान् ने भगवान् सूर्य से वेद एवं सभी प्रकार के व्याकरण का अभ्यास किया था। वह भी उनके ब्रह्मचर्य का तेज था। अब गोरी चमड़ी वाले राक्षसों की भाँति चमड़ी के कुण्ठित सुख में भ्रमित ये लोग क्या जाने सूर्य क्या है? एवं कौन उनके तेज को सहन कर सकता है। जो लोग मातृशक्ति के प्रति व्यभिचार भाव से मुक्त नहीं हो सकते वे सूर्य एवं ब्रह्म तेज को न तो जान सकते हैं एवं न ही धारण कर सकते हैं।

घोरकुण्ठा:— सूर्य को फल की तरह खाया भी जा सकता है ये भी अकेली इनकी ही खोज थी |

तर्कपूर्ण समाधान— बाल समय रवि भक्ष लियो जो हनुमान् संकट मोचनाष्टक है उसकी पंक्तियों ने इनको तिलमिला दिया है। ये एक सरल सी वैज्ञानिक एवं प्राणात्मक ऊर्जा सम्बन्धी घटना है। जिसका सीधा सा तात्पर्य है कि जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों पर बाल्यकाल से ही नियन्त्रण रखता है। ब्रह्मचर्य को साधता है धारण करता है। वह बाल्यकाल में ही सूर्यसे अधिक तेजस्वी हो जाता हैं उन्हें गिद्ध बन्धुओं की तरह सूर्य भगवान् अपने तेज से जला नहीं सकते।

अब यदि रोम व ग्रीस, मिस्र, इटली, सिसली आदि प्राचीन संस्कृतियों को देखो तो वहाँ की प्राचीन संस्कृति पर आधारित वर्तमान की अश्लील संस्कृति उनके पूर्वजोें के अश्लील साहित्य पर आधारित है। उनके साहित्य का अध्ययन करो तो पता चलेगा। कि नील नदी में पानी कहाँ से आया तो बताएंगे अमुक देवता ने अमुक कुकर्म किया था।

उनकी संस्कृति में व्यभिचार को कोइ अपराध नहीं माना इसीलिये वे तब से आज तक व्यभिचारी एवं अतिचारी माँसभक्षी हैं। वहाँ के कई प्राचीन दार्शनिकों ने तो राजा से अपेक्षा की थी कि राजा को चाहिये वह विद्यालय के स्थान पर महिला दासों के अड्डे खोले ताकि पुरूष वहाँ जाकर आनन्द करे।

यदि भारतीयों के सन्दर्भ में देखा जाय तो हमारे यहाँ हमारे आराध्यों ने मनुष्य जीवन मेें जो लीलाएँ कि जैसे ब्रह्मचर्य आदि तो हम आज भी संयमित हैं। भगवान् राम, महाबली हनुमान्, वेदव्यास, परशुराम, योगीराज योगेश्वर पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र जी, दत्तात्रेय, भगवान् शिव आदि जिनका आचरण चर्या एक आदर्श है संयम का हिमालय है।  यही बात इन प्रश्न कर्ता महानुभव के मन की टीस बनी हई है। गले की फाँस बनी हुई है।

घोरकुण्ठा:— बेशक राईट बंधुओ को हवाई जहाज के अविष्कार के निर्माण के श्रेय दिया जाता हो लेकिन ये उससे बहुत पहले ही पुष्पक विमान का निर्माण कर चुके थे | उसके बाद इनकी वायुयान निर्माण कला को क्या हुआ ये आज तक रहस्य है |

तर्कपूर्णसमाधान— आपका प्रत्येक कुण्ठा भरा प्रश्न भारतीय संस्कृति की योग्यताओं को उजागर कर रहा है। पुष्पक विमान का वर्णन तो कई पुराणों एवं इतिहास की पुस्तकों में प्राप्त होता है। एवं आधुनिक युग में राईट बन्धुओं के आविष्कार से पूर्व पूणे के बाबूराव शिवराम तलपड़े महोदय ने मुम्बई की चौपाटी पर एक मेकेनिकल विमान उड़ाया एवं उस समय बड़ौदा नरेश भी उपस्थित थे। आप नेट पर इस बात की पुष्टी कर सकते हैं।

राइटब्रदर्स तो आविश्कारक नही था आधुनिक वायुयान के आविष्कार कर्ता  तो कोई भारतीय वेदविज्ञानी ही थे। अब आपकेा इस सत्यता को सुन कर कष्ठ हुआ तो मैं क्षमा चाहता हूँ। पर सत्य को कोई झुठला नहीं सकता ।

वैसे भारत में भारद्वाज मुनि ने वैमानिकी शास्त्र की रचना की हैं वर्तमान में आर्य समाज से हिन्दी भाष्य सहित प्रकाशित भी है। आप में यदि वैमानिकी, त्रिविमीय ज्यामिती, स्थैतिकी, गतिकी, सदिश आदि गणितीय कलनाएँ पढ़ने की क्षमता एवं ज्ञान हो तो उसे पढ़ सकते हैं। पर आपने तेा अपनी बुद्धि हिन्दू धर्म की बुराई में लगाई हुई है आपके पास सही कार्याों को करने का अवकाश ही कहाँ है।

घोरकुण्ठा:— संजीवनी बूटी जैसी चमत्कारिक औषधि भी इन्हीं की खोज थी जिससे किसी भी मृत मनुष्य को जीवित किया जा सकता था लेकिन आज वो औषधि कहाँ हैं ये इनको भी आज तक नहीं पता है |

तर्कपूर्ण समाधान— रामायण में वर्णित संजीवनी बूटी का जो आपके मन में दु:ख है इसके लिये हम क्षमा याचना करते हैं। कि आपके साम्प्रदायिक ग्रन्थों में इस तरह का ज्ञान नहीं है। वरन् आप भी ज्ञान बाँटते न कि अपनी ही जड़ों केा काटने का ऐसा कुकर्म कर रहे होते।

आज भारत सरकार का ऐम्स जैसा ही एक महत्त्वपूर्ण प्रकल्प है आयुष जिसमें प्राचीन आयुर्विज्ञान से सम्बन्धित विधियों एवं औषधियों का अध्ययन किया जाता है। अब ये जानकारी तो इन मानसिक रुग्ण महोदय के लिये विष के समान होगी। पर सत्य है।

औषधी का प्रयोग मुख से, नसों में सूचिका से प्रवेश करवाकर, अथवा नस्य यानि नाक से सूघकर लेने की विधियों का उल्लेख मिलता है। अब आधुनिक विज्ञान यदि इन बातों को नहीं समझ सकता तो इसमें किसी महान् भारतीय के लिये अपराधी मानना तो ईर्ष्या का प्रतीक है।

महोदय के लिये विष के समान होगी। पर सत्य है।

डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी

 

07737050671

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मेरा नाम डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी, वर्तमान में संस्कृत में डी.लिट् हेतु प्रयत्नशील हूँं। मेरे शोध का विषय भारतीय धर्मशास्त्र और उनकी वर्तमान युग में प्रासंगिकता है। भारतीय संस्कृति व परम्पराओं के संवर्द्धन व संरक्षण हेतु मैं कटिबद्ध हूँ।

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