अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना -3

अथ कुतर्कोपशमनम् प्रारप्स्यते,मूर्तिपूजामण्डनम् एवं पुराण स्थापना – 3

घोर कुण्ठा— इनकी दूसरी महत्वपूर्ण खोज ३३ करोड़ देवी-देवताओं की खोज है | ये खोज इन्होने उस समय की, जब देश की कुल आबादी भी ३३ करोड़ नहीं थी| अब सारे 33 कोटि भगवान मर गये देखाई नहीं देते सोचिये !! इतने सारे देवी देवताओ की खोज में बेचारों को कितना पसीना बहाना पड़ा होगा ? अजी रात दिन एक कर दिए होंगे बेचारों ने।

तर्कपूर्ण समाधान— सर्वप्रथम ये जानना आवश्यक है कि देवता शब्द का निर्वचन क्या है? तो उसका निरूक्तकार ने अर्थ दिया है देवो दानाद वा…. देवता जो दूसरों को दे। इसका तात्पर्य है कि जो भी किसी अन्य को नि:स्वार्थ भाव से देता है। उसे देवता कहते हैं। अब इस सिद्धान्त से स्वत: ज्ञात होता है कि देवता कौन है। पुन: इन महामूर्ख महोदय ने 33 करोड़ देवी देवता कहे तो मैंने संस्कृत त्रयस्त्रिंशत्कोटि देवता वाक्य पढ़ा है जिसका अर्थ है कि 33 प्रकार के देवता इन हिन्दू धर्म से ईर्ष्या करने वाले ईर्ष्यालू महोदय ने इसे करोड़ कह दिया।
अब इन बेचारों को कितना पसीना बहाना पढ़ा होगा। जो कार्य हुआ ही नहीं है उसे इन्होंने पहले तो इस झूठ को बनाया फिर इस झूठ को सब के सामने परोसने में पर तब तो पसीना बहते बहते इनकी मरणासन्न स्थिति हो गई होगी अथवा हो जायेगी जब इनका झूठ व हिन्दू धर्म के प्रति द्वेष का सबके सामने उद्घाटन हो जाये।
देवता अमर कहे गये हैं। तो मर कैसे गये। अब ये देवता हैं क्या? और हमें देते क्या हैं? ऐसी मानसिक कुण्ठा इन प्रश्नकर्ता जैसे हिन्दू विरोधी कुण्ठितों के मन में स्वाभाविक रूप से उठने हैं तो उनका समाधान करते हैं।
ये देवता एक ऊर्जा स्वरूप हैं। एवं उनके द्वारा प्रदत्त सामग्री हमारे पास विभिन्न स्वरूपों में हमें प्राप्त होती है इसीलिये वे हमारे कल्याणकारक एवं संरक्षक हैं एंव हमारे लिये पूजनीय हैं। जैसे सूर्य देवता, साक्षात् ऊर्जा का स्वरूप हमें नित्य ही ऊर्जा, चेतना, स्वास्थ्य आदि अनगिनत उपयोगी तत्त्व प्रदान करते हैं। अब उन्हें देवता मानकर आभार तो वही नहीं मानेगा जो कृतघ्न हो या जिसे कहा अहसान फरामोष जो कि ये प्रश्न कर्ता है। इसी प्रकार चन्द्रमा देवता, वायु देवता, जल देवता, वृक्ष देवता, नदी देवता, आदि आदि इन सभी की हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इनके बिना हम रह ही नहीं सकते। यद्यपि ये हमें पका पकाया कुछ भी नहीं देते तथापि इनके द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक सामग्री से ही हम हमारे मनोनुकूल किसी भी पदार्थ का निर्माण करते हैं। ये देवता अमर हैं। और विश्व की केवल एक मात्र सर्वश्रेष्ठ और सनातन आर्य हिन्दू ही इन तथ्यों का समझा है एवं उनके प्रति आभार व्यक्त करता है क्योंकि केवल और केवल हिन्दू ही कृतज्ञ है बाकी कृतघ्नों की बर्बरता से विश्व इतिहास भरा पड़ा है। ऐसे में यदि ये देवता मरणधर्मा हो जायेंगे तो हमारा क्या होगा?
इन महामूर्ख प्रश्न करता को बेचारे को कितना परिश्रम करना पड़ा होगा। ऐसी कुण्ठाओं को एकत्रित करके लोगों को भ्रमित करने में पर ईश्वर की इच्छा देखें इसके कुतर्कों को ऐसे बिखेरा सम्भवत: इनकी मानसिक स्थिति का उपचार भी हो जाये।
घोर कुण्ठा:— आज चाहे वैज्ञानिक अभी तक दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश नहीं कर पाए लेकिन ये लोग बहुत पहले ही ऐसे दो लोकों की तलाश कर चुके हैं जहाँ पर जीवन मौजूद है और वो ग्रह हैं स्वर्ग लोक जहाँ पर अलौकिक शक्तियों के स्वामी देवता निवास करते हैं |
तर्कपूर्ण उपचार— आज वैज्ञानिकों ने क्या ढूँढा अथवा नहीं ढूँढा इस पर चर्चा करने से पूर्व ये बता दें कि हमारे विश्व के एक मात्र सत्य सनातन आर्य हिन्दू धर्म में विश्व की उत्पत्ति से लेकर उसकी समाप्ति तक के जो सूत्र दिये हैं। वह वैज्ञानिकों ने भी प्रमाणित किये हैं। अब वैज्ञानिकों के पास वो प्रयोगशाला नही है जो प्राचीन ऋषियों पास थी तो इसमें सत्य सनातन हिन्दू धर्मावलम्बियों को क्या दोष है? हाँ ऐसे प्रश्नकर्त्ता का अवश्य दोष हो सकता है।
महान् भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार स्वर्ग की स्थिति जहाँ बताई है वहाँ तो वैज्ञानिक कल्पना भी नहीं कर सकते। क्येंकि उसकी स्थिति तो आध्यात्मिक है एवं वैज्ञानिक भौतिक तत्त्वों तक ही सीमित हैं। अब रही बात दिखाई देने या न देने की तो। हिग्सबोसोन नामक कण की कल्पना वैज्ञानिको ने 100 वर्ष पूर्व कर ली थी। किन्तु प्रयोगशाला में उसे ये अब बना पाये तो क्या पूर्व के वैज्ञानिक झूठे थे और अब सच्चे हो गये। अत: जिन जिन सिद्धान्तों का वर्णन वेदों में प्राप्त होता है। उसे वैज्ञानिक आज नहीं समझ सकते इसीलिये वह कल्पना है परन्तु जिस दिन समझ लिया जाय तो वह वैज्ञानिक खोज होगी। जैसे सृष्टि उत्पत्ति के सम्बन्ध में ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में कई सिद्धान्त दिये हैं। उनमें वैज्ञानिक केवल दो सिद्धान्त समझ पाये हैं। तो दोष या अल्पज्ञता वैदिक ऋषियों की नहीं वरन् आधुनिक विज्ञान की क्षमता की सीमितता है।
वस्तुत: आज के वैज्ञानिकों की तुलना प्राचीन ऋषियों से करना महामूर्खता है। पर क्या करे इन जैसे हिन्दू धर्म विरोधियों को पैसे ही हिन्दूओं के विरोध में शंका खड़ी करने के मिलते हैं इसीलिये बेचारे पसीना बहाते हैं।
यदि हिम्मत हो तो अन्य किसी वैदेशिक धर्म के बारे में ऐसे प्रश्न करके बताओ तो पता चले कि तुम बड़े सत्यनिष्ठ हो।

घोर कुण्ठा:— विश्व के देशों ने चाहे कभी भी परमाणु बम,हाइड्रोजन बम जैसे विनाशकारी बमों का निर्माण किया हो लेकिन ये उससे बहुत पहले ही ऐसे ऐसे अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण कर चुके थे जो पूरी सृष्टि का विनाश करने में सक्षम थे | इन्होने उसको नाम दिया ब्रह्मास्त्र |
तर्कपूर्ण उपचार:— कुण्ठा के कारण ही सही इन्होंने ये सत्य बात कही कि हमारे पूर्वजों ने जो सौभाग्य से इन मूर्खाधिपति के पूर्वज नहीं थे उन्होंने हजारों हजार वर्ष पूर्व ब्रह्मास्त्र का आविष्कार कर लिया था। वह भी आज की तुलना में अधिक उच्च स्तरीय। वह मन की गति से मन द्वारा ही संचालित होता था, चलाने के बाद उसे लौटाया जा सकता था। तपस्या से ही प्राप्त होता था। किसी भी आतंकवादी के हाथ में नहीं जा सकता था। आदि आदि वैशिष्ट्यों की खान था। एक ही अस्त्र एक व्यक्ति को भी मार सकता था। एक सेना को भी मार सकता था। संचालक की इच्छानुसार नाश करता था।
खोजे हमारे पूर्वजो ने बहुत की किन्तु हमारे देश में तुम्हारे प्रश्नकर्ता के की तरह कुण्ठित होते हैंं जिनका उत्तर सम्यक् प्रतिकार में ही निबद्ध है।
हाँ आज वैज्ञानिक भी चाहते हैं कि कम्प्यूटर, बिजली, आदि कई उपकरण व व्यवस्थाएँ मनोनुकूल चलें एवं इसके लिये वे प्रयत्नशील हैं नित नये नये प्रयोग भी कर रहे हैं। पर वो वैज्ञानिक हैं इसीलिये इन कुतर्कीयों को उससे कोई कष्ट नहीं।
घोर कुण्ठा:— इन्होंने आज तक किसी आक्रमणकारी शत्रुओं के खिलाफ उसका प्रयोग क्यों नहीं किया ये अलग शोध का विषय है|
तर्कपूर्ण उपचार:— यहाँ पुन: इस महामूर्ख ने एक तथ्य महान् सत्य सनातन संस्कृति के बारे में लिख दिया कि दूसरों पर आक्रमण व बर्बरता हमारे महान् आर्य हिन्दू धर्म में नहीं है। पुन इन शस्त्रों की प्राप्ति तपस्या द्वारा होती है एवं इनकी सिद्धि इसकी प्राप्ति है किन्तु इसे योद्धा द्वारा धारण करने मात्र से योद्धा की कई सामान्य योग्यताओं में वृद्धि हो जाती है। एवं साधारण अस्त्रों से भी आप युद्ध जीत सकते हो। इस अस्त्र का सर्वप्रथम नियम ही यही है कि इसे मानवों पर नही चलाना चाहिये। इसको धारण करने मात्र से व्यक्ति अजेय बन जाता है। परन्तु ये अक्ल इन कुतर्कियेां को कौन दे?
जैसे परमाणु बम आतंकीयों के पास आ जाने से वे उसका क्या प्रयोग करेंगे ये सभी जानते हैं। इसके विपरीत इन दिव्यास्त्रों का प्रयोग संधान एवं ज्ञान आदि उसी व्यक्ति को दिया जाता था जो अपनी मृत्यु को स्वीकार कर ले परन्तु किसी सामान्य मनुष्य पर इसका प्रयोग नहीं करता। परन्तु ऐसी महानता इन बर्बर लोगों में कैसे आ सकती है।
घोरकुण्ठा— बाहर से कुछ सौ हजारों की संख्या में आक्रमणकारी आते रहे और इनको ३३ करोड़ शस्त्रधारी देवताओं के साथ धूल चटाते रहे ये अलग बात है |
तर्कपूर्ण समाधान:— आप स्वयं को देवताओं के विरेाधी भी कह रहे हो एवं यह भी चाहते हो कि देवता हमरी रक्षा भी करें। ये इन देवताओं का ही आशीर्वाद का परिणाम था कि पृथ्वी सिंह जोधपुर के राजकुँवर ने मात्र 13 वर्ष की आयु मे औरंगजेब के शेर को चीर दिया था। परिणाम स्वरूप औरंगजेब की रातों की नींद हराम हो गई एवं उसके प्रतिकार के रूप में दिखावे के लिये औरंगजेब ने उसे सम्मानित करने के लिये बुलवाया एवं विशेष विषयुक्त पौशाक भेजी जिसे पहनते ही वह वीर मृत्यु को प्राप्त हुआ। अब ये धोखाधड़ी विश्व की एक मात्र सर्वश्रेष्ठ एवं महानतम आर्य संस्कृति नहीं कर सकती इसीलिये ये प्रश्नकर्त्ता जैसे कुतर्की खड़े हो जाते हैं।
ये देवताओं का ही आशीर्वाद था कि महाराणा प्रताप के साथ युद्ध में सामने आये अकबर के एक गाजी सेनापति जो कि लोहे के कवच पहने हुये था। महाराणा प्रताप ने एक ही झटके मे घोड़े सहित दो टुकड़े कर दिया। ऐसे ऐसे अनेकश: उदाहरण भरे हुये हैं। हिन्दूयोद्धाओं के एवं उनकी वीरता के पर अब इन कुतर्कीयों को मानसिक बिमारी है तो उसका समाधान एक चिकित्सक ही कर सकता है।

डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी

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मेरा नाम डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी, वर्तमान में संस्कृत में डी.लिट् हेतु प्रयत्नशील हूँं। मेरे शोध का विषय भारतीय धर्मशास्त्र और उनकी वर्तमान युग में प्रासंगिकता है। भारतीय संस्कृति व परम्पराओं के संवर्द्धन व संरक्षण हेतु मैं कटिबद्ध हूँ।

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